आत्महत्या एक डरावनी प्रेम कहानी # लेखनी धारावाहिक प्रतियोगिता -09-Sep-2022
भाग -5
सिद्धार्थ अपने दोस्तों से स्टेशनरी की दुकान पर एक दिन अचानक मिलता है। जिनके साथ दीपा भी होती है।वो सभी पार्क में बैठकर काफी देर तक बातें करते हैं।दीपा के जोर देने पर सिद्धार्थ ने अपने दोस्तों के साथ पहली बार सिगरेट पी। यह जानते हुए भी कि यह सेहत के लिए हानिकारक है।वो अपना समान होस्टल से लेकर अपने दोस्तों के साथ एक किराए के कमरे में रहने के लिए आ गया।
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सिद्धार्थ अपने दोस्तों के साथ बिताए दिन की यादों में खोया था ।
उसके घर पर उसकी माँ और बड़ा भाई चिंतित हो आँगन में टहल रहे थे। दुल्हन के गृह प्रवेश का मुहूर्त बीता जा रहा था। सुबह का सूरज निकलने से पहले उन्हें शादी के बाद की सारी रस्में निभानी थी। जिसमें कम से कम दो घंटे लग ही जाते।
सिद्धार्थ की माँ सब पर गुस्सा कर रही है।
बारात और घर के सभी लोग जो शादी में गए थे रात बारह बजे से पहले ही लौट आए थे।अभी रात के तीन बज रहे थे, बेटे बहू की कोई खबर नहीं।
रास्ता भटक गए रात के अंधेरे में या फिर.. बहुत से बुरे ख्याल सबके मन में समा रहे थे।
कहीं जंगली जानवरों या डाकू लूटेरे.. नहीं नहीं.. मेरे बेटे को कुछ नहीं होगा।ये नई बहु अपशगुनी है जो गृह प्रवेश से पहले ही मेरे बेटे को मुझसे दूर कर दिया। शीला कमर पर हाथ रखे रात के अंधेरे में जुगनू की तरह टिमटिमाते आकाश में तारे और उसके आँगन में बिजली की लड़ियों से होती रोशनी में वो टहल कदमी कर रही है और सब पर झल्लाए जा रही है।
" मेरे लाल को अकेला छोड़ कर आ गया तुम लोग। किसी एक को तो उसके साथ रहना चाहिए था।कैसा भाई है तुम सब।"
"अरे माँ परेशान मत हो, वहां से विदाई का मुहूर्त ही डेढ़ बजे था । फिर हम सब वहां रुक कर क्या करते। सिद्धार्थ और ड्राइवर ने हमें कहां था वो आ जाएंगे कोई चिंता की बात नहीं। ड्राइवर मेरे ही ऑफिस का है अच्छी गाड़ी चलाता है।" शीला जी के बड़े बेटे ने माँ को समझाते हुए कहा।
घर के लगभग सभी लोग सो गए थे बस शीला जी और उनका बड़ा बेटा जाग रहा था।
"माँ तुम भी जाकर सो जाओ।"
"कैसे सो जाऊं, अभी कितना कुछ करना है।"
"अच्छा ठीक,थोड़ी देर बैठ तो जा।थक जाएगी तो कैसे स्वागत करेगी अपनी नई बहू का।"
"ये सब उसी कुलक्षिणी कुलटा के कारण हो रहा है।बस मेरा बेटा सही सलामत आ जाए।"
"जिसको तूने अब तक देखा भी नहीं है उसके बारे में ऐसे अपशब्द क्यों बोल रही है।आने में देरी हो रही है तो इसमें उस बेचारी की क्या ग़लती।"
" गलती मेरी है, बिना देखे,जाँचे परखे इस शादी के लिए हांँ कर दी।क्या पता किसी के प्यार-व्यार में फसी हो और उसका प्रेमी ही उसको लेकर भाग गया हो,मेरे बेटे को मार दिया हो।"
"हे भगवान!माँ तूं भी ना, दिन भर सीरियल और फिल्में देखकर कुछ भी सोचती रहती है। बहू अच्छी और संस्कारी है। मैंने देखा बहुत अच्छे से सारी रस्में निभा रही थी। ऐसा कुछ भी नहीं है जो तूं सोच रही है।हो सकता है विदाई सुबह करेंगे और सिद्धार्थ आराम से अपने ससुराल में मजे लूट रहा होगा।"
घड़ी ने तीन बजाए और तभी वो लाल गुलाब के फूलों से सजी सफेद कार शीला निवास पर आ खड़ी हुई। गाड़ी की आवाज से शीला अपनी बेटियों और बहुओं को उठाने अंदर आ गई और सिद्धार्थ के बड़े भाई गोविंद ने गेट खोला।
सिद्धार्थ भी दस साल पुरानी यादों से निकलते हुए भूल ही गया था कि दीपा नहीं साधना से उसकी शादी हुई है।
साधना लाल बनारसी साड़ी में लम्बा घूंघट किए इस तरह बैठी थी जैसे गहरे कुएं में कूद गई है । चारों तरफ अंधकार के सिवाय उसे कुछ नहीं दिख रहा था।
"ठीक तो हो तुम लोग। मुझे तो लगा रात ज्यादा होने के कारण अब सुबह ही आओगे। वैसे बहादुर है तुम्हारे साथ तो मैं निश्चिंत था।वो तो मांँ ही परेशान हो रही थी।"
"भईया ठीक हैं हम अब। बस बहुत थक गए हैं। अब उतरे कार से।"
सिद्धार्थ ने कहा तो गोविंद बोला, "रुक एक मिनट माँ बहु और तेरे स्वागत की तैयारी के लिए अंदर समान लेने और सबको जगाने गई है।सब लोग सो गए थे ना तुम्हारे इंतज़ार में।"
शीला ने सबको नींद से जगाया और पूजा घर में रखा समान लेने जाने लगी।
"काकी आ गई..काकू आ गए।"
शीला ने पोती को ताली बजा कर गोल गोल घूमते देखा।
"अरे! अरे! गिर जाएगी संभालो इसको। गिर कर हाथ पैर ना तोड़ ले।"
घर की सभी औरतें उठ कर बैठ गई।
हाथ में पीली साड़ी और एक थाली जिसमें बहुत सारे दिए जल रहे हैं।एक कलश जिस पर आम का पल्लव है सिर पर रखे, सिद्धार्थ की बहन और भाभी मंगल गीत गाते हुए आती हैं।कार पर से बुरी नजर उतारते हुए चावल छीटती है।
साधना को किसी ने हाथ पकड़ गाड़ी से उतारा।वो एक कदम भी नहीं चल पा रही है,खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा है उससे। उसके ऊपर से दीए निहुचे जा रहे हैं। जो कार में बैठे ड्राइवर के वेश में दीपा की आत्मा को बहुत खटक रहा है। यह जगह उसकी थी,उसे इस तरह अपना गृह प्रवेश करवाना था सिद्धार्थ के घर में।
पीली साड़ी पर ले जाया जा रहा है साधना को।रास्ता है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा।पता नहीं ये लोग कहां ले जा रहे हैं उसे। वो कुछ समझ ही नहीं पा रही है। आत्महत्या करने का यह अनोखा तरीका इतना खतरनाक होगा इससे अनजान थी वो।
ऐसा लग रहा था वो एक कदम आगे बढ़ रही है तो कोई दस कदम पीछे की तरफ कोई खींच रहा है उसे। सिद्धार्थ उसके आगे और वो उसके पीछे चल रही थी।
कुछ रस्में थी जो ससुराल में आने के बाद की जाती है जिनके लिए वो पहले बहुत उत्साहित रहा करती थी।पर आज मन में कोई उमंग कोई उत्साह नहीं था।जब जीवनसाथी ही बदल जाए जिसके साथ भविष्य के सपने देखे हों उसकी जगह किसी और को देना साधना के लिए इतना आसान नहीं था। फिर भी उससे जो जैसा कहता वो करती जाती।
थोड़ी देर में वो एक छोटे से कमरे में थी, जहाँ बहुत सारे लोग थे। वहां उसे बिठाया गया और एक पानी से भरे बर्तन में हाथ डालने को कहा गया। फिल्मों और टीवी सीरियल की तरह उसमें से अंगूठी नहीं निकालनी थी। उसमें तो कुछ और था। जिस पर उसका हाथ पड़ते ही वो चीख पड़ी और उछलती हुई वो खड़ी हुई और उधर पानी में से जिंदा बड़ी सी मछली कूदी
क्रमशः
(प्रिय पाठकों कहानी पसंद आ रही है तो बताईए अपनी समीक्षा में,अगर मुझे फॉलो नहीं किया है तो कीजिए और अगला भाग जल्द ही पढ़िए )
कविता झा'काव्या कवि'
#लेखनी
##लेखनी धारावाहिक लेखन प्रतियोगिता
18.09.2022
shweta soni
20-Sep-2022 12:38 AM
Nice 👍
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Pallavi
19-Sep-2022 09:20 PM
Beautiful
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Priyanka Rani
19-Sep-2022 09:00 PM
Very nice
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